आख़िरी लोकल: टिकट मांगने वाला वो TTE इंसान नहीं था!

सोचो... जो मुंबई लोकल, मुंबई वालों के लिए "लाइफलाइन" कही जाती है, जिसके भरोसे रोज़ लाखों लोग सुबह घर से निकलते हैं और रात को सही-सलामत लौटने की उम्मीद रखते हैं... वही लोकल अगर किसी को उसके घर नहीं, बल्कि मौत के स्टेशन पर उतार दे तो?

सोचो... रात का एक बजा है, डिब्बा लगभग ख़ाली है, खिड़की से ठंडी हवा आ रही है और आप थकान में आंखें मूंद लेते हैं। तभी कोई आपके कंधे को झकझोरता है और भारी, खरखराती आवाज़ में कहता है — "टिकट... टिकट दिखाओ..."

आप आंखें खोलते हैं... और सामने जो खड़ा है, वह इंसान नहीं है।

लोग कहते हैं, मुंबई की लोकल कभी सोती नहीं। पर सच यह है कि रात की आख़िरी लोकल में कुछ ऐसा भी जागता है, जो बरसों से अपनी सज़ा सुनाने के लिए किसी अकेले मुसाफ़िर का इंतज़ार कर रहा है।

यह कहानी है अरुण की — जिसने सितंबर 2019 की एक रात, बस घर पहुंचने की जल्दी में वह ट्रेन पकड़ ली... जिसे पकड़ना उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल बन गई।

अगर आप भी कभी देर रात अकेले लोकल में सफ़र करते हैं... तो यह कहानी पढ़ने के बाद शायद आप पीछे मुड़कर देखना नहीं भूलेंगे।


अरुण, उम्र लगभग अट्ठाईस साल, एक छोटे शहर से मुंबई आया था — बेहतर नौकरी और बेहतर भविष्य की तलाश में। मेहनत रंग लाई और उसे अंधेरी ईस्ट के सकीनाका इलाके की एक कंपनी में सीनियर अकाउंटेंट की नौकरी मिल गई। किराए का एक छोटा-सा फ्लैट उसने भायंदर में लिया था — दफ्तर से दूर ज़रूर था, पर मुंबई लोकल की बदौलत रोज़ का सफ़र आसान लगता था।

सितंबर 2019 का महीना था। कंपनी में सालाना ऑडिट का काम चल रहा था, और 30 सितंबर आख़िरी तारीख़ थी — उसके बाद देर करने का मतलब था भारी जुर्माना और मैनेजमेंट की डांट। इसी वजह से अरुण को 29 सितंबर की शाम दादर स्थित सीए ऑफिस जाना पड़ा, ताकि हिसाब-किताब की आख़िरी क्लोज़िंग एंट्रीज़ पूरी हो सकें।

दिनभर की थकान और रातभर के काम का बोझ — फिर भी अरुण जानता था कि यह ज़रूरी है। सीए साहब ने भी कहा था, "अरुण, आज काम पूरा करके ही जाना है। कल सुबह फाइलिंग है।"

घड़ी की सुइयां जब रात के 12:15 पर पहुंचीं, तब जाकर आख़िरी एंट्री पूरी हुई। अरुण ने राहत की सांस ली, अपना बैग कंधे पर टांगा और दादर स्टेशन की ओर भागा। उसे पता था — 12:49 की लास्ट फास्ट लोकल भायंदर के लिए यही आख़िरी उम्मीद थी, वरना पूरी रात स्टेशन पर काटनी पड़ती।

स्टेशन पहुंचकर उसे पता चला कि ट्रेन लेट है। प्लेटफॉर्म लगभग सुनसान था — कुछ मज़दूर एक कोने में सोए हुए थे, एक चाय वाला अपनी रेहड़ी समेट रहा था, और दूर कहीं से किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आ रही थी। रात का सन्नाटा और स्टेशन की पीली रोशनी — माहौल में एक अजीब-सी उदासी घुली हुई थी।

आख़िरकार रात करीब 1 बजे ट्रेन आई। अरुण थका हुआ था, आंखें भारी हो रही थीं, बस यही सोच रहा था — "घर पहुंचकर सो जाऊंगा, कल छुट्टी है, ऑडिट तो पूरा हो ही गया।"

डिब्बे में चढ़ते ही उसने देखा — पूरे कंपार्टमेंट में मुश्किल से तीन-चार यात्री थे। एक बुज़ुर्ग आदमी कोने में ऊंघ रहा था, दो लड़के हेडफ़ोन लगाए बैठे थे, और बाकी सीटें खाली थीं। अरुण को यह अच्छा ही लगा — भीड़ नहीं, शांति थी।

वह खिड़की वाली सीट पर बैठ गया। रात की ठंडी हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी, बालों को उड़ा रही थी। ट्रेन तेज़ी से भाग रही थी — यह फास्ट लोकल थी, जो सीधे बांद्रा पर रुकने वाली थी, फिर अंधेरी।

अरुण ने अपना फ़ोन निकाला। थकान के बावजूद नींद भगाने के लिए उसने एक हॉरर शो चलाया — स्क्रीन की नीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, कानों में हेडफ़ोन से डरावना बैकग्राउंड म्यूज़िक बज रहा था।

ट्रेन बांद्रा से गुज़री। अंधेरी नज़दीक आ रहा था। अचानक ट्रेन की रफ़्तार धीमी हुई — शायद सिग्नल की वजह से — और वह अंधेरी स्टेशन से कुछ पहले ही रुक गई। कुछ मिनट बाद, क़रीब 1:30 बजे, ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

लेकिन अरुण को इसका होश नहीं रहा। फ़ोन उसके हाथ में ही था, स्क्रीन ऑन थी, पर उसकी आंखें कब बंद हो गईं — उसे पता ही नहीं चला। हॉरर शो की डरावनी आवाज़ें अब सिर्फ़ एक धुंधले सपने का हिस्सा बन चुकी थीं।

"टिकट... टिकट दिखाओ..."

एक भारी, खरखराती हुई आवाज़ ने अरुण के कंधे को झकझोरा। नींद में डूबा अरुण चौंककर उठा। आंखें मलते हुए उसने इधर-उधर देखा — कंपार्टमेंट पूरी तरह ख़ाली था। न बुज़ुर्ग आदमी, न वो दोनों लड़के। सन्नाटा इतना गहरा था कि सिर्फ़ पटरियों पर लोहे के पहियों की घरघराहट सुनाई दे रही थी।

"टिकट... टिकट..."

वही आवाज़ फिर से, और भी नज़दीक से, और भी भारी — जैसे किसी सूखे गले से निकल रही हो, जैसे बरसों से पानी न पिया हो।

अरुण ने बिना ऊपर देखे अपनी जेब से टिकट निकाला और हाथ बढ़ाया। "ये लीजिए साहब..." कहते हुए जब उसने आख़िरकार नज़र ऊपर उठाई — उसका पूरा शरीर बर्फ़ की तरह जम गया।

सामने जो TTE खड़ा था, वह इंसान नहीं लग रहा था। उसकी वर्दी जगह-जगह से फटी हुई थी, मानो किसी ने नोच-नोच कर कपड़े उतारे हों। शरीर से एक सड़ी हुई, घिनौनी बदबू आ रही थी — जैसे महीनों पुराना सड़ा हुआ मांस हो। उसका चेहरा काला पड़ चुका था, आंखें गड्ढों में धंसी हुई, और उनमें कोई पुतली नहीं थी — सिर्फ़ खोखलापन। गर्दन एक अजीब कोण पर मुड़ी हुई थी, जैसे किसी ने उसे बुरी तरह मरोड़ दिया हो।

अरुण के मुंह से चीख़ निकलने से पहले ही वह डर के मारे सीट से नीचे गिर पड़ा। उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा अभी फट जाएगा।

वह भूत TTE धीरे-धीरे, झटकों में चलते हुए उसकी ओर बढ़ा — जैसे उसकी हड्डियां टूटी हों और हर कदम पर दर्द से चरमरा रही हों।

"टिकट वैलिड नहीं है... तुझे सज़ा मिलेगी... सज़ा!"

कहते ही उसने अपना भारी टिकट-बैग उठाकर अरुण पर दे मारा। बैग जैसे लोहे का बना हो — चोट लगते ही अरुण के सिर से दर्द की एक तेज़ लहर उठी। उसने हाथ उठाकर बचने की कोशिश की, पर शरीर मानो सुन्न पड़ गया था।

अरुण ज़मीन पर गिरा हुआ था, दर्द से कराह रहा था, लेकिन मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी — जैसे किसी ने उसकी आवाज़ छीन ली हो। वह चीखना चाहता था, मदद पुकारना चाहता था, पर गला सूख चुका था, ज़ुबान जैसे तालू से चिपक गई थी।

तभी कंपार्टमेंट के दूसरे छोर से एक हल्की सिसकी सुनाई दी।

अरुण ने डरते-डरते उस दिशा में देखा। एक सफ़ेद साड़ी में एक लड़की खड़ी थी — उसका चेहरा पीला और सूजा हुआ, आंखों से खून के धब्बे बह रहे थे। उसका शरीर बीच से बुरी तरह कटा हुआ था, मानो किसी ने उसे रेल की पटरी पर से उठाया हो। उसके पैर ज़मीन को छू नहीं रहे थे — वह हवा में तैरती हुई-सी आगे बढ़ रही थी।

"मुझे भी टिकट चाहिए..." वह फुसफुसाई, उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी वेदना और क्रूरता दोनों घुली हुई थीं। "तूने अकेले सफ़र क्यों किया... अकेले लोग हमें पसंद हैं..."

दोनों आत्माएं अब अरुण के चारों ओर मंडराने लगीं। TTE ने उसका कॉलर पकड़कर ऊपर खींचा, जबकि उस लड़की ने अपने ठंडे, बर्फ़ जैसे हाथों से उसका चेहरा पकड़ लिया। अरुण को महसूस हुआ जैसे उसकी नसों में बहता खून जम रहा हो। ट्रेन के डिब्बे की बत्तियां झिलमिलाने लगीं — कभी तेज़, कभी बिल्कुल बुझ जातीं। हर बार जब अंधेरा छाता, दोनों आत्माएं और नज़दीक आ जातीं, और हर बार जब रोशनी लौटती, उनके चेहरे पहले से ज़्यादा डरावने दिखते।

खिड़की के बाहर देखा तो अरुण को कुछ और भी सिहरा देने वाला नज़ारा दिखा — पटरियों के किनारे, अंधेरे में, कई परछाइयां साथ-साथ दौड़ रही थीं, मानो ट्रेन के साथ-साथ भाग रही हों।

अचानक, बिना किसी सिग्नल या स्टेशन के, ट्रेन ज़ोर के झटके के साथ रुक गई — मालाड स्टेशन के पास, जहां आमतौर पर फास्ट लोकल नहीं रुकती।

इस अप्रत्याशित झटके ने मानो उस अलौकिक बंधन को कुछ पल के लिए ढीला कर दिया। अरुण के गले से आख़िरकार आवाज़ फूट पड़ी —

"बचाओ!! कोई है?? बचाओ मुझे!!"

वह लड़खड़ाते हुए उठा और दरवाज़े की ओर भागा, पर दरवाज़ा जैसे किसी अदृश्य ताक़त से बंद था। उसने पूरी ताक़त से धक्का दिया, चिल्लाया, दरवाज़े को पीटा। पीछे से वह भारी आवाज़ फिर गूंजी —

"भाग नहीं सकता... कोई नहीं भाग सकता..."

ठीक बगल के लेडीज़ कंपार्टमेंट में ड्यूटी पर तैनात एक कॉन्स्टेबल को अरुण की चीख़ सुनाई दी। रात की गश्त कर रहा वह पुलिसकर्मी फ़ौरन दौड़ा और अगले डिब्बे में कूद गया।

जब उसने अंदर देखा — दृश्य रूह कंपा देने वाला था। अरुण फ़र्श पर पड़ा था, बेहोश, सिर से खून बह रहा था, चेहरा डर से पीला पड़ चुका था, आंखें आधी खुली हुई थीं। कंपार्टमेंट में और कोई नहीं था — न कोई TTE, न कोई लड़की। बस एक अजीब-सी सड़ांध हवा में तैर रही थी, जो धीरे-धीरे ग़ायब हो गई।

कॉन्स्टेबल ने तुरंत वॉकी-टॉकी से मदद बुलाई। अगले स्टेशन पर ट्रेन रोककर अरुण को नज़दीकी अस्पताल पहुंचाया गया।

पूरी रात अरुण बेहोश रहा। अगले दिन दोपहर बाद उसकी आंख खुली — सिर पर पट्टी बंधी थी, हाथ में ड्रिप लगी थी, और शरीर में हर तरफ़ दर्द था। शाम होते-होते वही कॉन्स्टेबल, जिसका नाम हवलदार सुरेश पाटील था, उससे मिलने अस्पताल पहुंचा।

"क्या हुआ था उस रात, बेटा? सच-सच बताओ," पाटील ने नरमी से पूछा।

अरुण ने कांपती आवाज़ में पूरी घटना बयां की — TTE का फटा हुआ शरीर, उसकी सड़ी बदबू, वह कटी हुई लड़की, टिकट मांगना, बत्तियों का झिलमिलाना, दरवाज़े का बंद हो जाना — सब कुछ।

पाटील की आंखों में कोई हैरानी नहीं थी। उसने एक लंबी सांस ली और खिड़की के बाहर देखते हुए कहना शुरू किया —

"बेटा, तुम अकेले नहीं हो जिसने यह देखा है। इस रूट पर, ख़ासकर भायंदर-नायगांव के बीच जो खाड़ी है — वहां कई साल पहले एक TTE की कुछ गुंडों ने बेरहमी से हत्या कर दी थी। रात की ड्यूटी में उसने कुछ लोगों को बिना टिकट पकड़ लिया था, बदले में उन गुंडों ने उसे बुरी तरह पीटा और चलती ट्रेन से खाड़ी के ऊपर से नीचे फेंक दिया। उसकी लाश कभी पूरी नहीं मिली — बस कुछ हड्डियां और वर्दी के टुकड़े मिले थे।"

"और वो लड़की?" अरुण ने डरते हुए पूछा।

"वो एक कॉलेज स्टूडेंट थी, कई साल पहले पटरी पार करते वक़्त ट्रेन की चपेट में आ गई थी। उसका शरीर दो हिस्सों में कट गया था... कहा जाता है, ऐसी अकाल मृत्यु पाने वाली आत्माएं इस दुनिया को छोड़कर नहीं जातीं। दोनों की आत्माएं अब भी इसी रूट पर भटकती हैं। ये सिर्फ़ उन्हें ही दिखाई देती हैं, जो रात की आख़िरी लोकल में अकेले, बिना किसी साथी के सफ़र करते हैं। कहते हैं, अकेला यात्री देखकर ये उसे अपने साथ ले जाने की कोशिश करते हैं — शायद इसलिए कि वो भी अकेले ही मरे थे।"

पाटील ने आगे कहा, "तुम भाग्यशाली हो, बेटा। मालाड में ट्रेन का यूं अचानक रुक जाना... वो भी बिना किसी वजह के... वो किसी चमत्कार से कम नहीं था। वरना अब तक शायद तीसरी आत्मा भी इस रूट पर जुड़ चुकी होती।"

अरुण कई दिनों तक उस रात को भूल नहीं पाया। ठीक होने के बाद भी, जब कभी वह देर रात लोकल में अकेला सफ़र करता, उसे वही सड़ांध महसूस होती, वही भारी आवाज़ कानों में गूंजती — "टिकट... टिकट दिखाओ..."

आज भी कहा जाता है कि पश्चिम रेलवे की आख़िरी लोकल्स में, अगर आप बिल्कुल अकेले बैठे हों और नींद आपकी आंखों पर हावी होने लगे — तो सावधान रहिए। हो सकता है, कोई आपके कंधे को थपथपाकर, उस भारी आवाज़ में आपसे भी टिकट मांग ले...

"टिकट... टिकट दिखाओ..."

 

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