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आख़िरी लोकल: टिकट मांगने वाला वो TTE इंसान नहीं था!

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सोचो ... जो मुंबई लोकल , मुंबई वालों के लिए " लाइफलाइन " कही जाती है , जिसके भरोसे रोज़ लाखों लोग सुबह घर से निकलते हैं और रात को सही - सलामत लौटने की उम्मीद रखते हैं ... वही लोकल अगर किसी को उसके घर नहीं , बल्कि मौत के स्टेशन पर उतार दे तो ? सोचो ... रात का एक बजा है , डिब्बा लगभग ख़ाली है , खिड़की से ठंडी हवा आ रही है और आप थकान में आंखें मूंद लेते हैं। तभी कोई आपके कंधे को झकझोरता है और भारी , खरखराती आवाज़ में कहता है — " टिकट ... टिकट दिखाओ ..." आप आंखें खोलते हैं ... और सामने जो खड़ा है , वह इंसान नहीं है। लोग कहते हैं , मुंबई की लोकल कभी सोती नहीं। पर सच यह है कि रात की आख़िरी लोकल में कुछ ऐसा भी जागता है , जो बरसों से अपनी सज़ा सुनाने के लिए किसी अकेले मुसाफ़िर का इंतज़ार कर रहा है। यह कहानी है अरुण की — जिसने सितंबर 2019 की एक रात , बस घर पहुंचने की जल्दी में वह ट्रेन पकड़ ली ... जिसे पकड़ना उसकी ज़िंदगी क...