काले जादू का खौफनाक साया: जब एक तोता बना पूरे परिवार की तबाही का कारण | Black Magic Horror Story
"यह ज़रूरी नहीं कि आपकी तरक्की देखकर हर कोई खुश हो... हो सकता है, जो चेहरे पर मीठी मुस्कान का नकाब ओढ़े बैठा हो, वह अंदर ही अंदर आपसे बेइंतहा जलन रखता हो। और वही जलन कभी-कभी इस हद तक बढ़ जाती है कि इंसान किसी का पूरा हँसता-खेलता परिवार तबाह करने पर उतर आता है।"
यह खौफनाक कहानी अमन की है, जिन्होंने बताया कि कैसे उनके ही एक सगे रिश्तेदार ने डाह और जलन की आग में अंधे होकर उनके पूरे परिवार की जिंदगी को एक जिंदा जहन्नुम बना दिया था।
अमन
राजस्थान के अलवर जिले
के एक शांत गाँव
के रहने वाले हैं।
यह खौफनाक हादसा साल 2019 का है, लेकिन
इस तबाही के बीज बहुत
पहले ही बो दिए
गए थे।
2019 से
पहले अमन का परिवार
बहुत सुखी था। हालांकि,
साल 2013 में उनके पिताजी
का एक लंबी बीमारी
के कारण देहांत हो
गया था। उस समय
परिवार टूट गया था,
घर में सिर्फ अमन,
उनका छोटा भाई सारांश,
छोटी बहन कंचन और उनकी बूढ़ी
माँ रह गए थे।
अमन के घर के
ठीक बगल में उनके
चाचा का घर था।
पिताजी
के गुजरने के कुछ ही
समय बाद अमन को
जयपुर शहर की एक
प्रतिष्ठित प्राइवेट फर्म में अकाउंटेंट
की नौकरी मिल गई। अमन
ने सारा बोझ अपने
मजबूत कंधों पर उठा लिया।
दोनों छोटे भाई-बहन
पढ़ाई में लग गए,
माँ घर संभालती थीं
और चाचा का परिवार
भी ऊपरी तौर पर
सहयोग करता था।
चाचा
दिल के नेक इंसान
थे और समय-समय
पर अमन के घर
का हाल-चाल ले
लिया करते थे। लेकिन
चाची... चाची का स्वभाव
बिल्कुल अलग था। उनके
दिल में अमन के
परिवार के लिए शुरू
से ही एक अजीब
सी कड़वाहट थी।
अमन
की दिन-रात की
मेहनत रंग लाने लगी
थी। परिवार अब आर्थिक रूप
से मजबूत हो चुका था।
अमन ने अपने छोटे
भाई सारांश को एक नई
चमचमाती बाइक दिलाई, कड़कड़ाती
गर्मी से राहत के
लिए घर में नया
AC लगवाया और अपने चलने-फिरने के लिए एक
सेकंड-हैंड कार भी
खरीद ली।
जब ये चीजें घर आईं, तो चाचा तो बहुत खुश हुए, लेकिन चाची की आँखों में एक तीखी, जहरीली जलन साफ देखी जा सकती थी। अमन का परिवार इन नई खुशियों को मना ही रहा था कि उन्हें यह नहीं पता था कि एक बेहद भयावह और खौफनाक नजर उनके हँसते-खेलते घर को निगलने के लिए तैयार बैठी है।
बात
जनवरी 2019 की है। कड़ाके
की ठंड पड़ रही
थी। एक दोपहर सारांश
कॉलेज से लौटकर घर
आया, तो उसने देखा
कि घर के आँगन
की ठंडी संगमरमर की
फर्श पर तोते का
एक छोटा सा बच्चा
पड़ा हुआ है। उसके
पंख फड़फड़ा रहे थे, लेकिन
वह उड़ नहीं पा
रहा था।
सारांश
को उस मासूम चिड़िया
पर तरस आ गया।
उसने उसे दुलार से
उठाया और एक लोहे
के पिंजरे में बंद कर
दिया। सारांश ने सोचा कि
वह इसे पालकर बड़ा
करेगा और इंसानों की
तरह बोलना सिखाएगा।
लेकिन
माँ और कंचन ने
उसे तुरंत टोका:
"पता
नहीं किसका तोता है? कहाँ से आया है? यूँ अचानक घर में आए किसी अनजान परिंदे को रखना शुभ नहीं होता सारांश, इसे बाहर छोड़ आ!"
पर सारांश ने किसी की
न सुनी। वह हठ करके
बैठ गया और तोते
को पालने का फैसला कर
लिया। यही एक फैसला
अमन के परिवार पर
काल बनकर टूटने वाला
था... एक ऐसा भयानक
साया, जिसकी कल्पना उन्होंने अपने बुरे से
बुरे सपने में भी
नहीं की थी।
तोते
को आए अभी मुश्किल
से एक हफ्ता ही
बीता होगा कि घर
के ठीक पीछे से
मांस के सड़ने की
एक बेहद गंदी और
असहनीय बदबू आने लगी।
बदबू इतनी तेज थी
कि घर के दरवाजे-खिड़कियां बंद करने के
बाद भी दिमाग भन्ना
जाता था।
सारांश
जब घर के पीछे
गली में देखने गया,
तो उसकी रूह काँप
गई। वही आवारा कुत्ता,
जो रोज शाम को
उनके घर रोटी खाने
आता था, वहाँ मरा
पड़ा था। लेकिन डरावनी
बात यह थी कि
कुत्ते का शरीर केवल
एक हफ्ते में इतना गल
चुका था जैसे महीनों
पुराना हो, और उसकी
आँखों की जगह दो
खाली खौफनाक गड्ढे थे।
अमन
के घरवाले इस नजारे से
काँप उठे। सारांश ने
हिम्मत करके गड्ढा खोदा
और कुत्ते के शव को
जमीन में गहराई में
दफना दिया। सब थके-हारे
सो गए।
लेकिन
असली खौफ अगली सुबह
शुरू हुआ...
अगली
सुबह जब बहन कंचन
छत पर गई, तो
उसकी चीख निकल गई।
वही कुत्ता, जिसे कल रात
4 फीट गहरे गड्ढे में
गाड़ा गया था, वह
जमीन के बाहर उखड़ा
हुआ पड़ा था! उसकी
अंतड़ियां बाहर निकली हुई
थीं और हवा में
लोह-सड़ांध की तीखी गंध
तैर रही थी।
सारांश के रोंगटे खड़े हो गए। कोई जानवर उसे इतनी सफाई से बाहर नहीं निकाल सकता था। घबराहट में सारांश ने उस गंदे शव को एक टाट की बोरी में ठूंस-ठूंस कर भरा और गाँव से बहुत दूर, सुनसान खेत के एक कोने में फेंक आया।
इस घटना को बीते
अभी दो ही दिन
हुए थे कि अमन
के घर में पारलौकिक
हादसों का एक भयानक
सिलसिला शुरू हो गया।
दो रातों बाद, शाम के
धुंधलके में माँ छत
से सूखे कपड़े समेटकर
नीचे उतर रही थीं।
सीढ़ियों पर सन्नाटा था।
अचानक, जब माँ पाँचवीं
सीढ़ी पर थीं, उन्हें
महसूस हुआ कि किसी
ने जमाया हुआ बर्फीला हाथ
उनकी पीठ पर रखा
और पूरी ताकत से
आगे ढकेल दिया!
"आहhh!"
माँ
सीढ़ियों से नीचे आ
गिरीं। किस्मत अच्छी थी कि ज्यादा
गहरी चोट नहीं आई,
पर उनके पैर में
भयानक मोच आ गई
और वे दर्द से
कराहने लगीं।
अभी
अमन और सारांश माँ
को संभाल ही रहे थे
कि अचानक चाची ना जाने
कहाँ से सीधे घर
के अंदर आ धमकीं।
उनके चेहरे पर एक अजीब
सी बेचैन उत्सुकता थी। आते ही
बोलीं—
"क्या
हुआ दीदी को? ज्यादा चोट तो नहीं आई न? सीढ़ियों से गिर गईं क्या?"
सारांश
का दिमाग भन्ना गया। माँ अभी
मुश्किल से 2 मिनट पहले
गिरी थीं। घर के
अंदर से कोई चीख
बाहर नहीं गई थी।
फिर चाची को कैसे
पता चला कि माँ
सीढ़ियों से गिरी हैं?
लेकिन माहौल ऐसा था कि
किसी ने इस बात
पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
उसी
रात, सारांश अपने कमरे में
सो रहा था। रात
के करीब 1:30 बजे उसकी नींद
अचानक खुल गई। पूरे
कमरे में एक बर्फ
जैसा ठंडा सन्नाटा फैला
हुआ था।
तभी
उसके कान के बिल्कुल
पास... इतनी पास कि
जैसे किसी की गर्म
साँसें उसकी गर्दन पर
पड़ रही हों... एक
हल्की, अजीब सी फुसफुसाहट
सुनाई देने लगी।
"खुसुर-फुसुर... खुसुर-फुसुर... फुस्स-फुस्स..."
भाषा
समझ में नहीं आ
रही थी, लेकिन वह
कोई मंत्र या बड़बड़ाहट थी।
सारांश ने डर के
मारे पूरे कमरे में
नजर दौड़ाई, पर वहाँ कोई
नहीं था। उसने चादर
सिर तक ओढ़ ली।
रात
के ठीक 3:30 बजे सारांश की आँखें दोबारा
खुलीं। फिर वही फुसफुसाहट!
इस बार आवाज थोड़ी
तेज थी। सारांश ने
हिम्मत जुटाई और मोबाइल की
टॉर्च जलाई। जैसे ही टॉर्च
की रोशनी कोने में रखे
पिंजरे पर पड़ी, सारांश
के होंठों से चीख निकलते-निकलते रह गई।
पिंजरा
बिल्कुल खाली था! लोहे की सलाखें
बंद थीं, लेकिन तोता
गायब था।
सारांश
का दिल इतनी जोर
से धड़क रहा था
मानो छाती फाड़कर बाहर
आ जाएगा। वह आँखें मल
ही रहा था कि
अचानक—एक पल की झपक में—तोता वापस पिंजरे
के अंदर बैठा हुआ
था! उसकी काली, बटन
जैसी आँखें अंधेरे में चमक रही
थीं और वह सीधे
सारांश को घूर रहा
था। और उसी पल,
वह फुसफुसाहट की आवाज अचानक
बंद हो गई।
अगले दिन जब जयपुर में अमन को माँ के गिरने और पैर टूटने की खबर मिली, तो वह तुरंत एक हफ्ते की छुट्टी लेकर गाँव आ गया।
शुरुआती
दो-तीन दिन सामान्य
बीते, लेकिन अमन को अंदाजा
नहीं था कि वह
किस शैतानी साए के जाल
में फँस चुका है।
एक रात, अमन देर
गए छत पर टहल
रहा था। हवा अचानक
रुक गई थी। टहलते-टहलते अमन को अहसास
हुआ कि उसके ठीक
पीछे कोई भारी कदमों
से चल रहा है।
अमन
ने एक कदम आगे
बढ़ाया—पीछे से आवाज
आई: "धाम!" अमन ने दूसरा
कदम बढ़ाया—फिर आवाज आई:
"धाम!"
अमन
का खून जम गया।
उसने झटके से पीछे
मुड़कर देखा... पीछे पूरी छत
खाली थी। दूर-दूर
तक केवल अंधेरा और
सन्नाटा था। अमन बिना
देर किए बदहवास हालत
में नीचे अपने कमरे
में भागा और दरवाजा
अंदर से बंद करके
सो गया।
लेकिन
खौफ उसका पीछा नहीं
छोड़ रहा था। रात
के किसी पहर अमन
को लगा कि उसके
कमरे का दरवाजा धीरे
से खुला है। एक
भारी, दमघोंटू मौजूदगी कमरे में दाखिल
हुई। अमन को लगा
कि कोई उसके बिस्तर
के ठीक सिरहाने खड़ा
होकर नीचे झुककर उसे
घूर रहा है।
अमन
ने झटके से आँखें
खोलीं। कमरे में कोई
नहीं था, लेकिन कानों
में फिर वही खौफनाक
फुसफुसाहट गूँजने लगी: "खुसुर-फुसुर... फुसुर-फुसुर..."
अमन
उठ बैठा। उसने देखा कि
यह आवाज उसके कमरे
से नहीं, बल्कि बाहर गलियारे से
होते हुए सारांश के
कमरे की तरफ से
आ रही थी। अमन
को लगा शायद सारांश
रात में किसी से
फोन पर बात कर
रहा है।
अगली
सुबह नाश्ते पर अमन ने
सारांश से पूछा—
"तू
रात को देर तक किससे फोन पर बात कर रहा था? कोई लड़की का चक्कर है क्या?"
सारांश
ने चाय का कप
नीचे रखा। उसका चेहरा
पीला पड़ गया। उसने
काँपती आवाज में कहा—
"भैया...
क्या आपने भी वह आवाज सुनी? मुझे लगा सिर्फ मुझे ही वह खौफनाक फुसफुसाहट सुनाई देती है! मैं कई रातों से सो नहीं पाया हूँ भैया... वह आवाज इंसानी नहीं लगती!"
अमन
का माथा ठनका। बात
सिर्फ वहम नहीं थी।
तभी
बहन कंचन और माँ
ने भी अपनी आपबीती
सुनाई। कंचन ने काँपते
हुए बताया—
"भैया,
मेरी नींद हर रात ठीक 2:00 बजे अपने आप खुल जाती है। ऐसा लगता है जैसे कोई कमरे के कोने में खड़ा होकर अजीब सी भाषा में बड़बड़ा रहा हो। और परसों रात... परसों रात मैंने देखा कि हमारे बंद कमरे में अचानक सफ़ेद, गाढ़ा धुआँ भरने लगा। मेरा दम घुटने लगा था, जैसे कोई अदृश्य हाथ मेरी गर्दन दबा रहा हो!"
अब पानी सिर से ऊपर जा चुका था। अमन समझ गया कि उनके घर पर किसी बहुत ही बुरी, काली ताकत का साया मंडरा रहा है।
उसी
रात अमन को जो
दिखने वाला था, वह
उसकी रीढ़ की हड्डी
में सिहरन पैदा करने के
लिए काफी था।
रात
के करीब 2:15 बजे, अमन की
नींद फिर उसी गंदी
फुसफुसाहट से खुली। इस
बार अमन ने ठान
लिया कि वह इस
रहस्य को देखकर रहेगा।
वह दबे पाँव उठा
और सारांश के कमरे की
तरफ बढ़ा।
कमरे
की खिड़की का एक शीशा
थोड़ा खुला हुआ था।
अमन ने दबे पाँव
खिड़की से अंदर झांका।
अंदर
सारांश गहरी नींद में
सो रहा था। लेकिन
वह खौफनाक आवाज उसी कमरे
से आ रही थी।
अमन ने अपनी नजरें
कमरे में घुमाईं... और
जो नजारा उसने देखा, उससे
उसका कलेजा मुँह को आ
गया!
पिंजरा
खाली था!
वह तोता पिंजरे में
नहीं था। वह कमरे
की सामने वाली दीवार पर...
बिल्कुल सीधा उल्टा (90 डिग्री पर) चिपक कर खड़ा था! गुरुत्वाकर्षण का उस पर
कोई असर नहीं हो
रहा था। उसकी गर्दन
180 डिग्री मुड़ी हुई थी और
उसकी आँखें अंगारे की तरह लाल
चमक रही थीं।
दीवार
पर थोड़ी दूर एक बड़ी
छिपकली रेंग रही थी।
वह तोता दीवार पर
किसी छिपकली की तरह रेंगते
हुए ऊपर बढ़ा... और
अचानक उसने अपनी चोंच
इतनी चौड़ी खोली जितनी किसी
चिड़िया की हो ही
नहीं सकती!
"क्रैच!"
एक ही झटके में
उसने छिपकली को अपनी विशाल
चोंच में दबोच लिया।
छिपकली का गाढ़ा खून
तोते के पंखों पर
बहने लगा।
और फिर... वह तोता धीरे
से अपनी गर्दन पूरी
पीछे घुमाकर खिड़की के बाहर खड़े
अमन की तरफ देखने
लगा! उसकी चोंच से
छिपकली का आधा कटा
शरीर लटक रहा था
और उसके चेहरे पर
एक इंसान जैसी खौफनाक, शैतानी
मुस्कान थी!
"आहhh!"
अमन
का दिमाग सन्न रह गया।
उसका संतुलन बिगड़ा और वह जमीन
पर गिर पड़ा।
तभी
कमरे के अंदर से
एक तेज फड़फड़ाहट हुई।
वह तोता खिड़की के
कांच को चीरता हुआ
हवा में उड़ गया
और अंधेरे में ओझल हो
गया।
अमन
बदहवास हालत में कमरे
के अंदर भागा। उसने
सारांश को झकझोर कर
उठाया। सारांश हड़बड़ा कर उठा। अमन
ने काँपते हुए, हाँफते-हाँफते
सारांश को पूरा मंजर
सुनाया और पूछा—
"तू
इस बला को कहाँ से लाया था सारांश?! वह कोई तोता नहीं है, वह कोई शैतान है!"
अभी
अमन अपनी बात पूरी
कर ही रहा था
कि... अचानक एक झटका लगा!
अमन
की आँखें खुलीं। वह अपने खुद
के बिस्तर पर लेटा हुआ
था! पसीने से पूरा शरीर
तर-बतर था। उसने
तुरंत दीवार पर लगी घड़ी
देखी—रात के ठीक 3:00 बज रहे थे!
अमन
का सिर घूमने लगा।
क्या वह कोई दुःस्वप्न
(Nightmare) था? या हकीकत?
तभी...
आँगन से फिर वही
फुसफुसाहट आने लगी।
अमन
हिम्मत जुटाकर कमरे से बाहर
निकला। जो उसने देखा,
उसने यह साबित कर
दिया कि वह कोई
सपना नहीं था। वही
तोता आँगन के फर्श
पर बैठा हुआ था।
फर्श पर खून के
धब्बे थे। जैसे ही
अमन ने कदम बढ़ाया,
तोता एक अमानवीय चीख
मारकर उड़ गया और
घर की छत से
पार निकल गया।
अमन उस पूरी रात सो नहीं सका। वह हाथ में लोहे की रॉड लिए भोर होने का इंतजार करता रहा।
अगली
सुबह, सूरज निकलते ही
अमन ने पूरे परिवार
को आँगन में इकट्ठा
किया। सबने अपने साथ
हो रही घटनाओं को
एक-दूसरे से साझा किया।
माँ
ने बताया कि पिछले कुछ
दिनों से जब भी
वे रसोई में होती
हैं, उन्हें लगता है कि
कोई उनके ठीक पीछे
सांसें ले रहा है।
कंचन ने कहा कि
उसकी शरीर की पूरी
ऊर्जा खत्म हो चुकी
है, वह हर वक्त
बीमार और कमजोर महसूस
करती है।
अमन
ने सख्त लहजे में
कहा—
"अब
बहुत हुआ। मैं आज ही गाँव के सबसे सिद्ध पंडित जी को लेकर आता हूँ। घर में हवन और शांति पूजा होगी।"
तभी
कंचन की नजर ऊपर
गई। उसकी चीख निकल
गई! वही तोता छत
की मुंडेर पर आकर बैठ
गया था और झुकी
हुई गर्दन से नीचे बैठे
पूरे परिवार की बातें बहुत
गौर से सुन रहा
था, जैसे सब समझ
रहा हो!
माँ
ने रोते हुए कहा—
"सारांश!
अभी के अभी इस मनहूस पंछी को ले जा और जंगल के सबसे घने हिस्से में छोड़ आ!"
सारांश
ने तुरंत पिंजरा उठाया (जिसमें तोता अपने आप
आकर बैठ गया था)
और बाइक से जाकर
उसे गाँव से 5 किलोमीटर
दूर गहरे जंगल में
छोड़ आया। इधर अमन
भागकर पंडित जी के पास
गया।
पंडित
जी बहुत ज्ञानी इंसान
थे। उन्होंने अमन की बात
सुनी और शाम को
घर आने का वादा
किया।
शाम
ढलते ही पंडित जी
अपनी पूजा की सामग्री
लेकर अमन के घर
पहुँचे। जैसे ही पंडित
जी ने घर के
मुख्य दरवाजे में कदम रखा,
वही तोता... जिसे दोपहर में
5 किलोमीटर दूर जंगल में
छोड़ा गया था... वह
उड़ता हुआ आया और
आँगन में रखे तुलसी
के पौधे के पास
बैठ गया!
पंडित
जी को देखते ही
वह तोता इंसानी आवाज
से मिलती-जुलती एक डरावनी, तीखी
आवाज में चीखने-चिल्लाने
लगा, मानो पंडित जी
को ललकार रहा हो!
पंडित
जी की नजर जैसे
ही उस तोते पर
पड़ी, उनका चेहरा गंभीर
हो गया। उन्होंने तुरंत
अपने झोले से पवित्र
जल निकाला और तोते पर
छिड़का। जल पड़ते ही
तोते के शरीर से
हल्का धुआँ निकला और
वह चीखता हुआ उड़ गया।
अमन
और सारांश ने पंडित जी
को उस रात की
पूरी खौफनाक दास्तान सुनाई।
पंडित
जी ने गंभीर आवाज
में कहा—
"अमन,
यह कोई साधारण परिंदा नहीं है। यह किसी तांत्रिक द्वारा सिद्ध किया हुआ एक बेहद खौफनाक शैतानी साया है, जो इस तोते के रूप में तुम्हारे घर में भेजा गया है। लेकिन इसे यहाँ से पूरी तरह भगाने के लिए मुझे 2 दिन का कठोर अनुष्ठान करना होगा। तब तक के लिए मैं तुम्हारे घर को तंत्र-मंत्र के कड़े सुरक्षा घेरे से बाँध रहा हूँ। वह शैतान अब इस घर की चौखट पार नहीं कर पाएगा।"
पंडित
जी ने घर के
चारों कोनों में अभिमंत्रित कीलें
गाड़ दीं, चारों तरफ
पीली सरसों छिड़क दी और चले
गए।
लेकिन
शैतान को चुनौती देना इतना आसान नहीं था...
उसी
रात, करीब 1:30 बजे, अमन की
आँख खुली। उसने देखा कि
कंचन अपने कमरे से
बाहर निकल रही है।
उसकी आँखें पूरी तरह सफ़ेद
थीं, जैसे वह किसी
सम्मोहन (Trance) में हो। वह
बेसुध हालत में चलती
हुई छत की तरफ
बढ़ने लगी।
अमन
उसके पीछे भागा—"कंचन! रुक!"
लेकिन
कंचन ने कुछ नहीं
सुना। वह छत पर
जाकर बिल्कुल किनारे पर खड़ी हो
गई। तभी, हवा में
अचानक एक भयंकर गर्जना
हुई। हवा इतनी तेज
चलने लगी कि छत
की गमले गिरकर टूटने
लगे।
कंचन
के ठीक सामने सफ़ेद
और काले धुएँ का
एक विशाल बवंडर उठा। उस धुएँ
के बीच से एक
भयानक, विकृत शैतानी चेहरा उभरा—जिसकी आँखें
जलते हुए अंगारे जैसी
थीं और मुँह से
नुकीले दांत बाहर निकले
हुए थे!
वह शैतान कंचन की तरफ
बढ़ा। अमन चिल्लाया—
"कंचनiii!"
लेकिन
इससे पहले कि अमन
कंचन तक पहुँच पाता,
उस शैतानी धुएँ ने कंचन
को हवा में ऊपर
उठाया और छत से
सीधे नीचे 15 फीट गहरे आँगन
में फेंक दिया!
अमन
जैसे ही आगे बढ़ा,
उस शैतान ने हवा के
एक ही थपेड़े से
अमन को पीछे दीवार
पर दे मारा। अमन
दर्द से कराह उठा
और वह शैतान अट्टहास
करता हुआ हवा में
गायब हो गया।
"धड़ाम!"
नीचे
आँगन से कंचन की
भयानक चीख गूँज उठी।
चीख सुनकर माँ और सारांश
बदहवास हालत में बाहर
भागे। नीचे कंचन खून
से लथपथ पड़ी थी।
उसके हाथ और पैर
दोनों की हड्डियां टूट
चुकी थीं।
अमन
बदहवास हालत में बगल
में चाचा के घर
भागा। आधी रात को
अमन को दरवाजे पर
बदहवास देखकर चाचा चौंक गए।
अमन ने रोते हुए
सारी बात बताई। चाचा
घबराकर तुरंत साथ चले आए।
लेकिन
अमन की नजर अचानक
चाची पर पड़ी... चाची
दरवाजे के पीछे खड़ी
होकर, मंद-मंद मुस्कुराते
हुए यह सारा मंजर
देख रही थीं! उनके
चेहरे पर कोई घबराहट
नहीं, बल्कि एक शैतानी संतोष
था।
उसी
रात चाचा और अमन
कंचन को पास के
कस्बे के अस्पताल ले
गए। कंचन का डॉक्टरों
ने इलाज किया, उसके
हाथ-पैर में भारी
प्लास्टर चढ़ा दिया गया।
डॉक्टरों ने कहा कि
उसे 3-4 दिन अस्पताल में
ही भर्ती रहना होगा।
माँ
ने तय किया कि
वे अस्पताल में ही कंचन
के पास रुकेंगी।
अगली
सुबह, अमन और चाचा
अस्पताल से सीधे पंडित
जी के घर के
लिए निकले, ताकि उन्हें बता
सकें कि सुरक्षा घेरा
टूट चुका है।
लेकिन
जब वे पंडित जी
के घर पहुँचे, तो
वहाँ का नजारा देखकर
उनके पाँव तले जमीन
खिसक गई! पंडित जी
के घर के बाहर
लोगों की भीड़ लगी
थी। अंदर जाकर पता
चला कि कल रात
पंडित जी जब सो
रहे थे, तो छत
का भारी लोहे का
पंखा अपने आप उखड़कर
सीधे पंडित जी के सीने
पर आ गिरा! वे
बुरी तरह घायल हो
गए थे और उसी
अस्पताल में ICU में भर्ती थे
जहाँ कंचन थी!
अमन
और चाचा तुरंत वापस
अस्पताल भागे। पंडित जी होश में
थे, लेकिन बहुत कमजोर थे।
अमन को देखकर पंडित
जी ने इशारे से
अपने पास बुलाया और
बहुत धीमी, काँपती आवाज में कहा—
"अमन... वह कोई मामूली भूत-प्रेत नहीं है... उसने कल रात मुझ पर हमला करके मेरी बली लेने की कोशिश की... उसने मुझे चेतावनी दी है कि मैं तुम लोगों के मामले से दूर रहूँ... वह कोई साधारण शैतान नहीं, बल्कि एक बेहद ताकतवर और खूंखार 'ख़बीश जिन्न' है! तंत्र से वह नहीं मरेगा... मेरी मानो, तो पास के गाँव के मौलाना साहब को तुरंत बुला लाओ... वही उस जिन्न को काबू कर सकते हैं। उन्हें मेरा नाम बता देना, वे मना नहीं करेंगे।"
अमन
और उसके चाचा बिना
एक पल गंवाए अपनी
गाड़ी से पास के
मुस्लिम बाहुल्य गाँव पहुँचे और
मौलाना साहब के सामने
हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
उन्होंने पूरी आपबीती कह
सुनाई।
मौलाना
साहब का चेहरा गंभीर
हो गया। उन्होंने कहा—
"बेटा,
मामला बहुत संगीन है। तुम तुरंत अपने घर के आँगन की थोड़ी सी मिट्टी लेकर आओ।"
अमन
ने तुरंत फोन करके सारांश
को घर के आँगन
की मिट्टी लेकर बुला लिया।
मौलाना
साहब ने उस मिट्टी
को एक तांबे के
बर्तन में रखा, ऊपर
से एक हरा कपड़ा
ढका और कुछ दुआएं
पढ़नी शुरू कीं। कुछ
ही मिनटों में बर्तन से
हल्का धुआँ निकलने लगा।
जब मौलाना साहब ने कपड़ा
हटाया, तो अमन और
चाचा की आँखें फटी
की फटी रह गईं—वह मिट्टी पूरी तरह जलकर कोयले जैसी काली और जहरीली हो चुकी थी!
मौलाना
साहब ने गंभीर नजरों
से अमन की तरफ
देखा और पूछा—
"वह
तोता कहाँ है?"
अमन
ने कहा—"जी, सारांश उसे कल जंगल में छोड़ आया था..."
मौलाना
साहब ने झटके से
सिर हिलाया—
"गलत!
वह तोता अब भी तुम्हारे ही घर के आसपास है। वह कोई परिंदा नहीं है, बल्कि काले जादू के जरिए सिद्ध किया गया एक 'ख़बीश जिन्न' है, जिसे तुम्हारे घर पर छोड़ा गया है! और सुनो... उस जिन्न को यह सख्त हुक्म दिया गया है कि वह तुम्हारे परिवार के किसी एक इंसान की जान लेकर ही वापस लौटेगा!"
अमन
के रोंगटे खड़े हो गए—"जान?!"
"हाँ!"
मौलाना ने कहा, "और यह
काम किसी बाहरी ने नहीं... तुम्हारे ही किसी बहुत करीबी जानकार ने अपनी जलन बुझाने के लिए किया है! मैं कल सुबह तुम्हारे घर आऊँगा, लेकिन तब तक के लिए यह सूती काला धागा लो। इस पर मैंने आयतें पढ़ी हैं। इसे तुरंत अपने, अपने भाई, अपनी माँ और बहन की कलाई पर बाँध दो। जब तक यह धागा कलाई पर है, वह जिन्न सीधे तुम्हारी जान नहीं ले पाएगा। जाओ!"
अमन,
चाचा और सारांश तुरंत
अस्पताल पहुँचे और वह धागा
कंचन और माँ के
हाथों में बाँध दिया।
भाग
8: अस्पताल में मौत का तांडव
उस रात, चाचा के
कहने पर अमन और
सारांश चाचा के घर
पर ही रुक गए।
लेकिन अमन की आँखों
से नींद गायब थी।
रात
के करीब 11:30 बजे, अमन को
अपने बंद घर (जो
बगल में ही था)
के अंदर से भारी
चीजें पटकने की आवाजें आने
लगीं। ऐसा लग रहा
था जैसे कोई अलमारियां
उखाड़ रहा हो, कांच
के बर्तन दीवार पर मार रहा
हो। सारांश भी उठ बैठा।
दोनों खौफ से काँपते
हुए सुबह का इंतजार
करने लगे।
तभी...
रात के ठीक 12:00 बजे अमन के फोन
की घंटी बजी!
स्क्रीन
पर माँ का नंबर
चमक रहा था। अमन
ने झटके से फोन
उठाया—
"हॉलो!
माँ?!"
दूसरी
तरफ से कंचन की
दहाड़ मार-मारकर रोने
की आवाज आई—
"भैया!
भैया जल्दी आओ! माँ को कुछ हो रहा है! कोई अदृश्य ताकत माँ को मार रही है! जल्दी आओ भैया!"
अमन
और सारांश के होश उड़
गए! उन्होंने बिना चाचा को
बताए बाइक निकाली और
आधी रात को ही
अस्पताल की तरफ भाग
खड़े हुए।
अस्पताल
गाँव से 5 किलोमीटर दूर
कस्बे में था। सड़क
के दोनों तरफ घना सन्नाटा
और खौफनाक अंधेरा था। बाइक 80 की
स्पीड में दौड़ रही
थी।
अचानक...
सड़क के बीचों-बीच,
टॉर्च की रोशनी में
अमन को एक विशाल,
बिना सिर वाली काली
आकृति खड़ी दिखाई दी!
"ब्रेक
मार सारांश!" अमन चिल्लाया।
सारांश
ने जोर से ब्रेक
दबाया, लेकिन बाइक स्किट कर
गई और घसीटते हुए
सड़क किनारे एक मोटे नीम
के पेड़ से जा
टकराई!
"धड़ाम!"
दोनों
सड़क पर जा गिरे।
अमन का घुटना छिल
गया और सारांश के
हाथ में चोट आई।
लेकिन अमन को अपनी
चोट की परवाह नहीं
थी। उसने जेब से
फोन निकाला और काँपते हाथों
से मौलाना साहब को फोन
लगाया।
मौलाना
साहब ने फोन उठाते
ही कहा—
"अमन!
मुझे खबर मिल गई है! कुछ भी हो जाए, अपनी कलाई का वह धागा मत खोलना! मैं यहाँ से दुआ पढ़ रहा हूँ, तुम हिम्मत रखो!"
किसी
तरह अमन ने बाइक
उठाई, किक मारी और
अस्पताल पहुँचा।
अस्पताल
के कमरे का नजारा
खौफनाक था। माँ बेड
पर बेसुध पड़ी थीं, उनके
हाथ की हड्डी टूट
चुकी थी। अस्पताल के
घबराए हुए स्टाफ ने
बताया कि कुछ देर
पहले कमरे की खिड़कियां
अपने आप बंद हो
गईं और माँ अचानक
हवा में 4 फीट ऊपर उठीं
और किसी ने उन्हें
पूरी ताकत से फर्श
पर दे मारा!
अमन की आँखों से आँसू बहने लगे। उस कड़ाके की रात में अमन और सारांश अस्पताल के ठंडे गलियारे में बैठकर सुबह होने की दुआ मांगते रहे।
सुबह
होते ही अमन सारांश
को अस्पताल में माँ और
बहन की देखभाल के
लिए छोड़कर तुरंत गाँव पहुँचा। चाचा
भी घर के बाहर
खड़े थे।
कुछ
ही देर में मौलाना
साहब एक बड़े थैले
के साथ अमन के
घर पहुँचे। अमन दौड़कर उनके
पास अपनी माँ के
साथ हुए हादसे को
बताने लगा, लेकिन मौलाना
साहब ने हाथ उठाकर
रोक दिया—
"मुझे
सब पता है अमन। कल रात वह खबीश जिन्न तेरी माँ की रूह खींचने आया था। लेकिन जब तूने मुझे रास्ते से फोन किया, तो मैंने अपने काबू किए हुए 'पाक जिन्नात' को भेजकर किसी तरह तेरी माँ की जान बचाई। मेरा भेजा हुआ जिन्न अभी भी अस्पताल में तेरी माँ और बहन की हिफाजत कर रहा है। लेकिन अब... अब मुझे यहाँ असल दुष्ट से निपटना होगा।"
मौलाना
साहब ने चाचा की
तरफ देखा और सख्त
लहजे में कहा—
"इस
घर के अंदर सिर्फ वही रह सकता है जिसका इस खून से ताल्लुक है। आप बाहर जाइए!"
चाचा
चुपचाप बाहर चले गए।
मौलाना साहब ने घर
का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद
कर लिया।
मौलाना
साहब ने आँगन के
बीचों-बीच एक सफ़ेद
अभिमंत्रित पाउडर से बड़ा सा
घेरा (हिसार) बनाया और उसके अंदर
बैठ गए। उन्होंने अमन
से कहा—
"तू
इस घेरे से बाहर नहीं निकलेगा और चाहे कुछ भी हो जाए, अपनी जुबान से एक शब्द नहीं निकालेगा!"
अमन
कोने में दुबक कर
बैठ गया। मौलाना साहब
ने जोर-जोर से
अरबी में आयतें पढ़नी
शुरू कीं।
अचानक...
दिन के 11 बजे, जब कड़क
धूप खिली होनी चाहिए
थी, पूरे घर में
घोर अंधेरा छाने लगा! घर
के तापमान में इतनी गिरावट
आई कि अमन के
मुँह से भाप निकलने
लगी।
चारों
तरफ से किसी खूंखार
जानवर के गुर्राने की
भयानक आवाजें आने लगीं: "ग्रर्रर्रर्र... ग्रर्रर्रर्र!"
अचानक
कमरे के चारों कोनों
से गाढ़ा सफ़ेद और काला धुआँ
निकलने लगा। धुआँ आँगन
के बीचों-बीच इकट्ठा होने
लगा और कुछ ही
सेकंड में उस धुएँ
ने एक 8 फीट लंबे,
खौफनाक साए का रूप
ले लिया! उसकी चमड़ी जली
हुई थी, आँखें लाल
अंगारे जैसी थीं और
उसके मुँह से सड़े
हुए मांस की बदबू
आ रही थी।
मौलाना
साहब ने अपनी आँखें
खोलीं और गर्जती आवाज
में पूछा—
"कौन
है तू?! और किसके हुक्म से इस बेगुनाह परिवार पर जुल्म ढा रहा है?!"
वह खबीश जिन्न अपनी
खौफनाक, भारी आवाज में
दहाड़ा—
"मैं
'ख़बीश' हूँ! इस औरत... इसकी चाची ने मुझे तंत्र विद्या से बांधकर यहाँ भेजा है! मुझे इस परिवार के किसी एक इंसान की बलि चाहिए! ऐ मौलाना, तू पीछे हट जा! वरना मैं तुझे भी चीरकर फेंक दूंगा!"
अमन
ने जब सुना कि
उसकी सगी चाची ने यह सब
किया है, तो उसकी
आत्मा काँप गई! जिस
चाची को उसने हमेशा
सम्मान दिया, वह इतनी नीच
हरकत कर सकती है?!
मौलाना
साहब बिल्कुल नहीं डरे। वे
चिल्लाए—
"तुझे
खाली हाथ जाना होगा ख़बीश!"
ख़बीश
जिन्न हवा में उड़ते
हुए चिल्लाया—
"मैं
खाली हाथ नहीं जाऊँगा! अगर कोई नहीं मिला, तो मौलाना मैं तेरी ही जान ले लूँगा!"
इतना
कहते ही उस जिन्न
ने चीखना शुरू कर दिया।
उसकी चीख से घर
की छत के प्लास्टर
झड़ने लगे! घर में
रखे भारी-भारी बर्तन,
लोहे की कुर्सियां हवा
में उड़ने लगीं और दीवारों
से टकराकर टूटने लगीं!
मौलाना
साहब ने तुरंत अपनी
तसबीह उठाई और ऊँचे
स्वर में दुआएं पढ़नी
शुरू कीं।
अचानक,
आँगन के चारों कोनों
से रोशनी के 4 विशाल पुंज
प्रकट हुए! मौलाना साहब
के भेजे हुए 4 पाक
जिन्नात वहाँ आ पहुँचे।
उन्होंने उस खबीश जिन्न
को चारों तरफ से दबोच
लिया और भारी जंजीरों
से बाँध दिया!
ख़बीश
जिन्न दर्द से तड़पने
और चिल्लाने लगा—
"मुझे
छोड़ दो! मुझे छोड़ दो! मैं चला जाऊँगा!"
मौलाना
साहब ने खड़े होकर
कहा—
"कसम
खा कि तू इस परिवार की तरफ कभी मुड़कर नहीं देखेगा!"
ख़बीश
जिन्न ने रोते हुए
कसम खाई। मौलाना साहब
ने इशारा किया और उन
4 जिन्नात ने उस ख़बीश
जिन्न को खींचकर हवा
के एक बवंडर में
गायब कर दिया!
अचानक
घर का माहौल बिल्कुल
शांत हो गया। अंधकार
छट गया और सूरज
की तेज रोशनी आँगन
में आ गई।
मौलाना
साहब ने राहत की
सांस ली और अमन
से कहा—
"अब
तू बोल सकता है अमन।"
अमन
रोते हुए मौलाना साहब
के पैरों में गिर पड़ा—
"मौलाना
साहब! चाची ने ऐसा क्यों किया? हमारी क्या गलती थी?"
मौलाना
साहब ने उदास आवाज
में कहा—
"अमन, तेरी तरक्की... तेरा नया AC, तेरे भाई की नई बाइक, तेरी कार... यह सब देखकर तेरी चाची की आँखों में जलन का जहर भर गया था। वह तेरे परिवार में मातम देखना चाहती थी। इसीलिए उसने अपने मायके के एक तांत्रिक से मिलकर इस ख़बीश जिन्न को तोते के रूप में तेरे घर भिजवाया था, ताकि वह किसी एक की जान ले ले।"
अभी
मौलाना साहब की बात
पूरी ही हुई थी
कि अचानक घर का मुख्य
दरवाजा जोर से खुला!
अमन
के चाचा बदहवास हालत
में अंदर भागे। उनके
पीछे चाची रोती-बिलखती
हुई आई और सीधे
मौलाना साहब के कदमों
में गिर पड़ी!
चाची
चीख-चीखकर रो रही थीं—
"मौलाना
साहब! मुझे बचा लीजिए! मेरे बेटे को बचा लीजिए! वह शैतान मेरे बेटे के पीछे पड़ गया है! वह उसे मार डालेगा!"
अमन
और मौलाना साहब समझ गए
कि पासा उल्टा पड़
चुका था!
जब ख़बीश जिन्न अमन
के घर से नाकाम
होकर लौटा, तो वह कमजोर
हो चुका था। उसे
अपनी शक्ति बनाए रखने के
लिए किसी न किसी
इंसानी खून की जरूरत
थी। और चूँकि चाची
ने ही उसे जागृत
किया था, इसलिए वह
जिन्न अब चाची के
अपने इकलौते बेटे की रूह
खींचने पहुँच गया था!
मौलाना
साहब ने अपनी आँखें
बंद कीं और अपने
जिन्नात के जरिए उस
ख़बीश को पल भर
के लिए वापस हाजिर
किया।
मौलाना
ने पूछा—
"तू
उसके मासूम बच्चे के पीछे क्यों पड़ा है?"
ख़बीश
जिन्न की गूँजती आवाज
आई—
"मुझे
अपनी उम्र 100 साल और बढ़ाने के लिए जान चाहिए थी! अगर मुझे इस परिवार की बलि नहीं मिली, तो जिसने मुझे बुलाया है, मैं उसी के बच्चे को घसीटकर जहन्नुम ले जाऊँगा!"
चाची
बदहवास होकर अपने बाल
नोचने लगीं—"नहीं! मेरे बच्चे को छोड़ दो! मुझे मार डालो!"
मौलाना
साहब ने जिन्न से
कहा—
"अगर
तुझे इंसानी जान की जगह 10 बकरों की बलि दी जाए, तो क्या तू इस बच्चे को छोड़ेगा?"
ख़बीश
जिन्न कुछ देर हवा
में घूरता रहा और फिर
भारी आवाज में बोला—
"मुझे
मंजूर है! लेकिन अगर कल सूरज ढलने तक 10 बकरों का खून मुझे नहीं मिला, तो मैं इस पूरे खानदान को खत्म कर दूंगा!"
इतना
कहकर वह हमेशा-हमेशा
के लिए गायब हो
गया।
मौलाना
साहब ने चाची की
तरफ नफरत से देखा
और कहा—
"जाओ!
कल सुबह होने से पहले 10 बकरों का इंतजाम करो और गाँव के बाहर वीराने में बलि दो! वरना तुम्हारा बेटा कल का सूरज नहीं देख पाएगा!"
चाची रोती हुई चाचा के साथ वहाँ से भाग गई।
उस खौफनाक हादसे के बाद कंचन
और माँ धीरे-धीरे
अस्पताल से ठीक होकर
घर वापस आ गईं।
लेकिन
उस दिन के बाद
से अमन के परिवार
ने चाचा और चाची
के परिवार से अपने सारे
रिश्ते हमेशा-हमेशा के लिए तोड़
दिए। अमन के परिवार
ने अपने घर पर
बड़ा अनुष्ठान करवाया और कुछ महीनों
बाद वे वह गाँव
छोड़कर जयपुर शहर में ही
हमेशा के लिए शिफ्ट
हो गए।
आज भी अमन जब
उस 2019 की भयानक रातों
को याद करते हैं,
तो उनकी रूह काँप
उठती है।
कहानी
की सीख: अपनी जिंदगी में मेहनत कीजिए और तरक्की कीजिए। लेकिन हमेशा अपने आसपास के लोगों पर नजर रखिए। कभी-कभी सबसे गहरा घाव वही इंसान देता है, जिस पर आप आंखें मूंदकर भरोसा करते हैं। जलन एक ऐसा काला जादू है, जो इंसान को हैवान बना देता है!
