जयपुर हॉस्टल की सच्ची डरावनी कहानी | दोस्त की आत्मा ने किया कब्ज़ा || Dost ke Bhoot ne kiya Kabja

"कभी-कभी एक दोस्ती इतनी गहरी हो जाती है कि एक दोस्त दूसरी दुनिया में भी उस दोस्त को अपने साथ खींच ले जाना चाहता है। हमारे यहाँ कहते हैं कि यादें सहेज कर रखो, पर जिस व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है, उसकी चीज़ें या तो त्याग दो या जला दो... क्योंकि वे चीज़ें उस रूह के लिए इस दुनिया का दरवाज़ा बन सकती हैं।

मैंने भी वही गलती कीअनजाने में ही सही, पर मेरी उस एक छोटी सी चूक ने मुझे एक बेहद भयानक एहसास के पास लाकर खड़ा कर दिया। एक ऐसा साया, जिसने मेरे वजूद को लगभग मिटा ही दिया था। उस खौफ़नाक मंज़र से मैं बड़ी मुश्किल से निकल पाया हूँ, पर क्या सच में सब कुछ खत्म हो गया है? पेश है मेरे साथ हुई वह सच्ची और सिहरन पैदा कर देने वाली दास्तान..."


"नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम दीपक है। मैं जोधपुर के पास एक गाँव का रहने वाला हूँ। बात उन दिनों की है जब मैं जयपुर में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था। साल 2008 में मेरा फर्स्ट ईयर था और मैं फार्मेसी की डिग्री के लिए जयपुर के एक मशहूर कॉलेज में पढ़ रहा था। अपने गाँव से दूर, घर वालों का और अपना सपना पूरा करने की उम्मीद में कि इस डिग्री के बाद कुछ कुछ बढ़िया होगा।


एक रात की बात है, हम सब हॉस्टल में रुके हुए थे और डिनर करके सोने की तैयारी थी, कि तभी अचानक रोहन, जो हमारा सीनियर था, हमारे कमरे में भागता हुआ आया और बोला— 'तुम लोगों ने सुना क्या? आर्यन की रोड एक्सीडेंट में जान चली गई!'

वह अपने गाँव बिलाड़ा के लिए निकला था, पर उसकी बस की टक्कर एक ट्रक से जयपुर-अजमेर हाईवे पर हो गई। वह ड्राइवर के बगल वाली सीट पर ही बैठा था। सामने से ट्रक लेन तोड़ते हुए घुस आया और मौके पर ही ड्राइवर और आर्यन को मिलाकर 7 लोगों की जान चली गई। हम सबने जैसे ही यह खबर सुनी, हम सन्न रह गए। हमारे बदन में कपकपी छूट गई। कल ही मैं उससे मिला था, हंसता-मुस्कुराता मस्तमौला लड़का था... पर चला गया। उस रात मुझे हर जगह बस उसी का चेहरा दिख रहा था और अगले एक हफ्ते तक मैं सदमे में रहा।


उस हादसे के लगभग एक महीने बाद हम सब फर्स्ट ईयर के एग्जाम की तैयारी में लग गए। एग्जाम नज़दीक था। एक रात मैं पढ़ाई करते हुए काफी लेट हो गया, तो सिगरेट पीने हॉस्टल की बालकनी में चला गया। तभी अचानक मैंने कुछ ऐसा देखा कि मैं सिहर गया। मुझे बगल वाले कमरे की बालकनी में ऐसा लगा कोई खड़ा है और वह भी सिगरेट पी रहा है। पर जैसे ही वह पीछे मुड़ा, मैं डर के मारे कांपने लगा... क्योंकि वह कोई और नहीं, आर्यन था! उसका चेहरा कटा-फटा और लहूलुहान था, जो मुझे देख कर मुस्कुराने लगा।

मैं अपने होश खोने ही वाला था कि तभी पीछे से मेरे रूममेट कार्तिक की आवाज़ आई— 'क्या हुआ भाई? सोना नहीं है क्या?' मैं होश में आते ही कमरे के अंदर भागा और बिना किसी को कुछ बताए चादर ओढ़ कर सो गया।

उसका भयानक चेहरा अब मुझे हर जगह दिखाई देने लगा था, पर मैं किसी से कुछ कह नहीं पा रहा था। इसी बीच एग्जाम भी किसी तरह निकल गए और सारे बच्चे छुट्टियां मनाने अपने घर लौटने लगे। मैंने भी प्लान बनाया था कि मैं गाँव जाऊँगा। जयपुर शहर में मेरे ही गाँव के दो लोग और थे जो अपनी कार से गाँव जा रहे थे। उन्होंने मुझे भी साथ चलने को कहा। मैंने सोचा बस से जाने से अच्छा है कि इनके साथ निकल जाऊँगा।

उनका प्लान था कि रात 11 बजे निकलेंगे और सुबह 6 बजे तक घर पहुँच जाएंगे। पर जब मैंने सुना कि वे रात को जाने का प्लान बना रहे हैं, तो मैं ठिठुर गया। पिछले कुछ दिनों से जो मेरे साथ हो रहा था उसका डर, ऊपर से जयपुर-जोधपुर की नाइट ड्राइव! पर मैंने हिम्मत जुटाई और तैयार हो गया।


हॉस्टल के बहुत सारे बच्चे पहले ही जा चुके थे, बस इक्का-दुक्का ही बचे थे जो दिन में निकल गए। वे लोग मुझे रात को हॉस्टल से पिक करने वाले थे। शाम के वक्त ही पूरा हॉस्टल खाली हो चुका था, सिर्फ वार्डन और सिक्योरिटी गार्ड ही मौजूद थे। रात के करीब 8 बजे होंगे, मुझे ऐसा लगा जैसे बाहर गलियारे (passage) में कोई टहल रहा है और हाथ में किताब लेकर कुछ पढ़ रहा है। हल्की-हल्की धीमी आवाज़ मेरे कानों में रही थी। मैं सहम गया, दरवाज़ा खोलकर देखने की हिम्मत नहीं हुई।

अब आवाज़ धीरे-धीरे और तेज़ होने लगी, फिर थोड़ी देर बाद बिल्कुल शांति छा गई। अभी कुछ ही वक्त हुआ होगा कि बाहर पैसेज में ऐसा लगा कोई बैठकर रो रहा है। रात के 9:30 बज चुके थे, सारे कमरे बंद थे, लाइट भी ऑफ थी और पैसेज के एक कोने से किसी के रोने की आवाज़ रही थी। मैंने हिम्मत करके दरवाज़ा खोला, पर बाहर कोई नहीं था। तभी अचानक सीढ़ियों के बगल वाले कोने में एक काली परछाई खड़ी दिखाई दी। मैं सहम गया। वह काली परछाई बस वहीं खड़ी एक कमरे के सामने रोए जा रही थी। उसकी आवाज़ तेज़ होने लगी थी और मैं डर के मारे कमरे के अंदर दुबक कर बैठ गया।


मैं 11 बजने का इंतज़ार कर रहा था। मैंने उन लोगों को फोन लगाया, तो उन्होंने बताया कि बस एक घंटे में पहुँच रहे हैं। मैंने कहा— 'भाई थोड़ा जल्दी जाओ, पता नहीं यहाँ क्या हो रहा है, मुझे बहुत डर लग रहा है।' उधर से जवाब आया— 'क्या यार तू भी ना! चल रहे हैं।' इतना कहकर फोन काट दिया।


तभी अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैं डर के मारे खड़ा हो गया। मैंने कांपते हुए पूछा— '--कौन?' कोई जवाब नहीं आया। मैंने फिर पूछा— 'कौन है?' तभी किसी के सिसकने की आवाज़ आने लगी। कमरे में अचानक बहुत ठंड बढ़ गई थी। मैं अपना आपा खोने ही वाला था कि तभी एक फुसफुसाहट सुनाई दी'दीपक...... दी--...' और अचानक फिर सन्नाटा।

मेरी रूह कांप गई। मैंने कहा— 'कौन है? क्या मेरे दोस्त मज़ाक कर रहे हैं?' मैंने चिल्लाकर कहा— 'यार तुम लोग हो तो बता दो, ऐसा मज़ाक मत करो।' कोई जवाब नहीं मिला, तभी किसी ने धीरे से कहा'दीपक, मुझे भूल गया? मैं आर्यन...'


आर्यन! नाम सुनते ही मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। मैंने कांपते हुए कहा— 'आर्यन... नहीं, तू आर्यन नहीं है!' तभी अचानक कमरे का बल्ब फूट गया और गहरा अंधेरा छा गया। कमरे में धुआं भरने लगा और एक परछाई सामने उभरी। वह कोई और नहीं, आर्यन ही थाया उसकी आत्मा! वही कटा-फटा चेहरा और खून जैसी लाल आँखें, जो मुझे घूर रही थीं।

उसने कहा— 'दीपक, मैं अकेला हूँ... तू भी मेरे साथ चल।' मैं बोलने की हालत में नहीं था, शायद डर के मारे मेरी पैंट गीली हो गई थी। वह मेरी तरफ बढ़ने लगा और अपने कटे-फटे हाथ फैला दिए। उसे पास आता देख मैं ज़ोर से चिल्लाया, पर मेरी आवाज़ कमरे से बाहर नहीं गई। अचानक उसकी आत्मा मेरे अंदर समाने लगी, ऐसा लगा मेरा गला दब रहा है। मेरी आँखें बंद होने लगीं और मैं बेहोश हो गया। उसके बाद क्या हुआ, मुझे नहीं पता।

 


मेरी आँख अगले दिन शाम के वक्त सीधे मेरे गाँव वाले घर में खुली। मेरे सामने मम्मी-पापा और वह दो दोस्त खड़े थे। पूछने पर पता चला कि वही मुझे यहाँ लेकर आए हैं। घर वालों ने कहा कि अभी आराम करो, बाद में बताएंगे। मेरे बिस्तर के चारों ओर अगरबत्ती का धुआं था और हाथ में कलावा (मौली) बंधा हुआ था। मुझे समझते देर नहीं लगी कि यहाँ कोई बड़ी पूजा-पाठ हुई है।


तीन दिन बाद जब मैं ठीक हुआ, तो आनंद ने पूरी बात बताई। उसने कहा— 'हम हॉस्टल 11:30 बजे पहुँचे थे। तू फोन नहीं उठा रहा था। गार्ड ने कहा कि सब बच्चे जा चुके हैं, पर हमें यकीन था कि तू वहीं है। जब हम सेकेंड फ्लोर पर पहुँचे, तो पूरा फ्लोर एकदम काला पड़ा था और तेरे कमरे से धुआं निकल रहा था। हमने दरवाज़ा पीटा पर कोई जवाब नहीं मिला। गार्ड की मदद से जब दरवाज़ा तोड़ा, तो देखा कि तू कमरे के कोने में अपना सिर दीवार पर पीटे जा रहा था... खट-खट-खट!'


आनंद ने तुरंत अपने गले से हनुमान जी का लॉकेट निकालकर मेरे माथे पर रख दिया और मैं बेहोश हो गया। फिर वे मुझे गाड़ी में डाल कर जोधपुर ले आए। मेरे पिताजी ने सुबह ही पंडित जी को बुलाया। पूजा के दौरान मैं अचानक उठा और चिल्लाने लगा— 'मैं नहीं जाऊँगा! इसे लेकर जाऊँगा, ये मेरे साथ जाएगा!' मुझमें जाने कहाँ से इतनी ताकत गई थी, पर पंडित जी ने किसी तरह कंट्रोल किया। जब पूछा कि 'कौन है?' तो मैंने (आर्यन की आत्मा ने) बताया कि वह आर्यन है। वह बोला कि गाँव जाने से पहले वह दीपक से ही मिला था और वह उसका करीबी दोस्त बन चुका है, इसलिए वह उसे साथ ले जाने आया है।


पंडित जी ने बताया कि दीपक के पास आर्यन की एक शर्ट पड़ी है, जिसे वह पहन चुका था, इसीलिए उसकी आत्मा दीपक से जुड़ गई है। हमें उस शर्ट को जलाना होगा। अभी के लिए हाथ में अभिमंत्रित कलावा बांधा गया है, जिससे मैं ठीक हुआ।


मुझे याद आया कि एक संडे हम फिल्म देखने गए थे, जहाँ मैंने आर्यन की शर्ट पहनी थी और उसे लौटाना भूल गया था। ठीक होने के एक हफ्ते बाद मैं और पिताजी जयपुर गए और वह शर्ट ढूंढकर जला दी। पर वह कलावा मैंने आज भी पहन रखा है, क्योंकि मुझे आज भी कहीं कहीं किसी साये का एहसास होता है। मैंने सोच लिया है कि यह कलावा हमेशा पहनूंगा।

पर हाँ, एक बात जो मैंने किसी को नहीं बताई... आर्यन की शर्ट तो मैंने जला दी, पर उसकी एक और चीज़ आज भी मेरे पास है। कहीं वह अब भी मेरे पीछे तो नहीं? क्योंकि एहसास आज भी होता है, शायद इस कलावे की वजह से बचा हुआ हूँ।

वह चीज़ क्या है, जानना चाहते हो?"



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