जान जाए पर उस बगीचे से मत जाना…” आखिर क्यों कहते थे गाँव वाले?

कहते हैं कि कभी-कभी बुजुर्ग जिस काम के लिए मना करते हैं, उन्हें मान लेना चाहिए। पर हम जवानी के जोश में अक्सर ऐसे कदम उठा लेते हैं जहाँ जान पर बन आती है। कुछ ऐसा ही हादसा मेरे पिताजी के साथ हुआ जहाँ उन्होंने बुजुर्गों की बात को दरकिनार कर अपने जवानी के जोश में ऐसी गलती की जहाँ पर उनकी जिंदगी बड़ी मुश्किल से बच पायी। अगर उस रात उन्हें कुछ हो जाता तो शायद यह कहानी बताने के लिए मैं आज इस दुनिया में ही नहीं होता। वैसे मेरे पिताजी के साथ दो बहुत भयानक डरावने हादसे हुए हैं पर उनमें से एक वाकया मैं आज आप लोगों के साथ साझा कर रहा हूँ।

नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम अरुण है। मैं यूपी के जिला गोरखपुर के एक गाँव का रहने वाला हूँ। मैं जो ये भयानक वाकया आपके साथ शेयर कर रहा हूँ, वो मेरे पिताजी के साथ साल 1985 में हुआ था, जब यूपी के गाँव बहुत पिछड़े होते थे। गाँव में किसी तरह की बिजली थी और ही सड़क हुआ करती थी। आप सोच सकते हैं उस वक्त सड़कें नहीं थी, कच्चे रास्ते हुआ करते थे और गाँव की आबादी भी कम हुआ करती थी। लोग एक जगह से दूसरे जगह जाने के लिए साइकिल या फिर बैलगाड़ी का इस्तेमाल किया करते थे।






ये बात है उस वक्त की जब मेरे पिता 10वीं क्लास की परीक्षा दे रहे थे। मैं आप लोगों को बता दूँ, उस दौर में जब भी परीक्षा होती थी तो एग्जाम सेंटर गाँव से कहीं दूर या किसी और जिले में लगता था। जहाँ पर सेंटर आता था, वहां कुछ बच्चे मिलके एक घर किराये पर लेते थे। जब तक एग्जाम होता वहीं रहते, वहीं खाना बनाते और एग्जाम पूरा होने के बाद ही लौटते। मेरे पिताजी भी, जिनका सेंटर काफी दूर लगा हुआ था, वो भी गाँव के ही कुछ और दोस्तों के साथ उस सेंटर के पास वाले गाँव में शिफ्ट हो गए थे।

मेरे पिताजी बताते हैं कि पूरा एग्जाम तो बहुत अच्छा गया, पर जिस दिन आखिरी पेपर था, उसके एक रात पहले कुछ ऐसा हुआ कि वे बुरी तरह डर गए। उस रात वो पढ़ाई के लिए देर तक जाग रहे थे बाकी बच्चों के साथ, कि तभी उन्हें लघुशंका (पेशाब) महसूस हुई। वो किराये के मकान से निकल कर सामने खाली खेत में चले गए। अब उस वक्त किसी तरह की लाइट थी, ही कोई रोशनी। वो बस खड़े होकर पेशाब कर ही रहे थे कि सामने खाली खेत में उन्हें दूर एक 'काला कंबल' ओढ़े कोई खड़ा दिखाई दिया। उन्हें लगा गाँव का ही कोई होगा। पर जब उन्होंने दोबारा देखा, तो वो आकृति अब धीरे-धीरे चलकर उनकी ही तरफ रही थी। और तो और, उसका चेहरा साफ़ नहीं था और सिर के ऊपर से हल्का-हल्का सफेद धुआं जैसा कुछ निकल रहा था। वो जैसे-जैसे पास रहा था, उसका आकार किसी दानव की तरह बड़ा होता जा रहा था। सन्नाटे के बीच उसके पैरों की चलने की 'धप-धप' आवाज साफ़ सुनाई देने लगी।

मेरे पिताजी जो अभी तक शांत थे, उसे अपने इतने पास आता देख घबरा गए और वहीं खड़े-खड़े जोर से बाकी बच्चों का नाम लेकर चिल्लाने लगे"अजय, मनोज, राम जतन!" उनकी चीख काफी जोर की थी, मानो किसी ने उनका गला दबोच लिया हो और वो छटपटा रहे हों। वो साया बस बिल्कुल पास आने ही वाला था कि अचानक उनके बाकी दोस्त बाहर दौड़कर आए। दोस्तों को देखते ही वो साया ओझल हो गया, पर पिताजी वहीं बेहोश पड़े थे। वो सब उन्हें उठाकर कमरे में ले गए। इतने में ये आवाज सुनकर उस किराये के मकान का मालिक भी वहां गया। वो पिताजी को देखते ही समझ गया कि मामला क्या है। वो दौड़कर घर के अंदर गया और गंगाजल ले आया। उसने पिताजी को दो चम्मच गंगाजल पिलाया और साथ में भभूत की राख माथे पर लगाई। बाकी बच्चों ने पूछा कि क्या हुआ, तो बात को टालते हुए मकान मालिक ने कहा, "कुछ नहीं, तुम्हारे दोस्त के ग्रह कमजोर चल रहे हैं, इसलिए बेहोश हो गया। सब ठीक है।" शायद मकान मालिक बच्चों को डराना नहीं चाहता था ताकि उनका एग्जाम सही तरीके से पूरा हो जाए।

 



खैर, सुबह तक पिताजी को पूरी तरह होश गया था। एग्जाम का समय सुबह का था, उन्होंने जाकर परीक्षा दी। एग्जाम खत्म कर सारे बच्चे अपना सामान पैक कर अपने-अपने घर जाने की तैयारी करने लगे। मेरे पिताजी के साथ गाँव का एक और बच्चा था, पर उसने कहा कि वो गाँव नहीं जाएगा, वो सीधा अपने मामा के यहाँ शादी में जा रहा है क्योंकि उसका पूरा परिवार वहीं है। सारे बच्चे अपनी-अपनी साइकिल लेकर शाम करीब 4:00 बजे अपने-अपने घर की तरफ निकल चले।

घर की दूरी वहां से करीब-करीब 60 किलोमीटर थी, जिसे पूरा करने में उस वक्त साइकिल से 5 से 6 घंटे लग जाते थे। सभी बच्चे निकले तो साथ थे, पर धीरे-धीरे सबका रास्ता अलग होता गया। आखिर में पिताजी और दो गाँव आगे का एक लड़का बचा था। मेन सड़क पर आकर वो लड़का सीधा अपने गाँव की तरफ निकल गया। अब पिताजी को मुख्य सड़क से उतरकर 5 किलोमीटर अंदर अपने गाँव जाना था। ये सफर उन्हें अकेले तय करना था। रात के करीब 9:30 बज चुके थे। आप सोच ही सकते हो, 1985 के दौर में रात के 9:30 बजे यूपी के एक गाँव का क्या मंजर होता होगा। घुप अंधेरा... रात में दूर कहीं सियारों के चिल्लाने की आवाज और सन्नाटे में झींगुरों की 'चिं-चिं' की आवाज, मानो माहौल को एकदम डरावना बना रही थी। पर पिताजी जवानी के जोश में थे, कहाँ इन पर ध्यान देने वाले थे।

उस कच्चे रास्ते से गाँव जाने के दो रास्ते थे। एक आम कच्चा रास्ता जहाँ से ज्यादातर लोग आते-जाते थे और बैलगाड़ियाँ चला करती थीं। और दूसरा रास्ता एक 'घने बगीचे' से होकर जाता था, जहाँ से लोग रात में जाना पसंद नहीं करते थे। शाम ढलते ही लोग उस रास्ते को भूल जाते थे। बगीचे वाला रास्ता 'शॉर्टकट' था और पिताजी का घर गाँव के जिस कोने में था, वहां से इस रास्ते से बहुत जल्दी पहुँचा जा सकता था। दूसरे रास्ते से पूरे गाँव का चक्कर लगाकर जाना पड़ता था। पिताजी ने इस रास्ते की बहुत सारी कहानियाँ सुन रखी थीं। कई बुजुर्गों ने सूरज ढलने के बाद यहाँ से जाने को मना किया था। गाँव में तो यहाँ तक कहावत थी कि"जान जाए तो जाए, पर बगीचे वाले रास्ते पर 'वो' मिल जाए!"


पिताजी को पूरी बात पता थी, उन्होंने हर कहानी सुन रखी थी। पर कहते हैं , जब जवानी जोश मारती है तो सारी बातें बेकार लगती हैं। पिताजी ने सोचा, "साइकिल चलाकर थक गया हूँ, 20 मिनट एक्स्ट्रा साइकिल चलानी पड़ेगी। बगीचे वाले रास्ते से चलता हूँ, जल्दी पहुँचकर आराम कर लूँगा। और क्या ही हो जाएगा? अभी तो रात के 10 भी नहीं बजे हैं।" बस, यही सोच उन्हें कितनी भारी पड़ने वाली थी, इसका उन्हें अंदाजा भी नहीं था।

पिताजी ने साइकिल बगीचे वाले रास्ते की ओर मोड़ ली। उस वक्त उनके पास एक रेडियो हुआ करता था जो उन्होंने साइकिल के हैंडल पर टांग रखा था। रेडियो पर पुराने गाने चल रहे थे। गानों की धुन और टॉर्च की रोशनी के साथ पिताजी उस रास्ते से होते हुए बगीचे के पास पहुँच चुके थे। वो बगीचा लगभग 1 किलोमीटर तक उस रास्ते को घेरे हुए था। घना अंधेरा, पुराने पेड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी टहनियाँ और सन्नाटा... आप जरा सोचिए, उस वक्त अगर आप अकेले ऐसे बगीचे से गुजर रहे हों तो क्या हालत होगी?

बगीचे में दाखिल होने से पहले पिताजी ने टॉर्च की रोशनी थोड़ी तेज की, रेडियो का वॉल्यूम बढ़ाया और 'महादेव' का नाम लेकर चल दिए। अब हम सोचेंगे कि ऐसे वक्त में कोई भी होगा तो साइकिल तेज भगाएगा, पर उस दौर के कच्चे रास्ते और पुरानी साइकिल... चाहकर भी रफ्तार नहीं पकड़ी जा सकती थी। जैसे ही वो बगीचे के बीचों-बीच पहुँचे, अचानक तेज ठंडी हवाएं चलने लगीं। पेड़ों की टहनियां आपस में टकराकर ऐसी आवाजें करने लगीं मानो कोई रो रहा हो या फुसफुसा रहा हो।


पिताजी हिम्मत कर आगे बढ़ रहे थे कि अचानक उन्हें अपने पीछे किसी की 'आहट' सुनाई दी। ऐसा लगा जैसे कोई नंगे पैर उनके पीछे-पीछे भाग रहा है। पिताजी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मन में बस यही था कि कुछ दूर की बात है, घर जाएगा। पिताजी बताते हैं कि थोड़ी देर बाद रेडियो की आवाज़ में गड़गड़ाहट आने लगी। जो रेडियो अभी तक गानों की धुन बजा रहा था, उसमें गड़गड़ाने की आवाज़ आने लगी। पिताजी ने रेडियो पर थपकी मारी कि अचानक रेडियो बंद हो गयारेडियो बंद होते ही ऐसा लगा कि कोई रो रहा हो और पिताजी को हल्की-हल्की पायल की छन-छन आवाज़ भी सुनाई देने लगी…. पिताजी घबरा गए कि ये क्या हो रहा है?


तभी अचानक टॉर्च की रोशनी में सामने सड़क किनारे कोई खड़ा दिखाई दिया। पिताजी का शरीर ठंडा पड़ गया, उन्होंने साइकिल धीमी कर ली, पर आगे बढ़ते रहे। नजदीक जाने पर देखा कि एक 'लाल साड़ी' पहने हुए औरत पेड़ के नीचे घूंघट डाले खड़ी थी। पिताजी को कुछ समझ नहीं आया, उन्होंने ब्रेक लगाकर साइकिल रोक दी। अब यहाँ कोई भी होता तो भाग जाता, पर पिताजी ने रुककर पूछा"--कौन है? कौन हो तुम?"

कोई जवाब नहीं आया। पिताजी ने टॉर्च की रोशनी उसके चेहरे की तरफ की और फिर पूछा"कौन है?" तभी उस औरत ने धीमी, भारी आवाज में कहा"बाबूजी, मैं राधे श्याम जी के पोते की बहू हूँ। शौच करने निकली थी, यहाँ रास्ता भटक गई हूँ।" पिताजी थोड़े सहज हुए क्योंकि राधे श्याम का बेटा राम ललित उनके घर के पास ही रहता था। उन्होंने पूछा"राम ललित की बीवी?" औरत ने कहा"हाँ बाबूजी।"

पिताजी ने कहा"कोई बात नहीं, चलो मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूँ। पर तुम अकेली क्यों आई? राम ललित या किसी और को साथ ले लेती?" औरत ने जवाब दिया"वे सरकारी काम से शहर गए हैं, दो दिन बाद लौटेंगे। और मेरी सास की तबीयत बहुत खराब थी, इसलिए अकेले निकलना पड़ा।" पिताजी ने कहा"ठीक है, चलो।"


पिताजी साइकिल से उतरकर पैदल चलने लगे और उस औरत से कहा कि आप आगे-आगे चलो। अभी वो 10 कदम ही चले होंगे कि अचानक वो औरत नीचे गिर गई। पिताजी ने पूछा"क्या हुआ?" वो कहने लगी"बाबूजी, लगता है पैर में कांटा चुभ गया है, अब पैदल नहीं चला जाएगा। आप मुझे साइकिल के पीछे बैठा लीजिए।"

पता नहीं पिताजी किस सम्मोहन में थे, उन्होंने उस औरत को साइकिल के पीछे कैरियर पर बैठा लिया। जैसे ही वो बैठी, पिताजी को महसूस हुआ कि साइकिल अचानक 'पत्थर' जैसी भारी हो गई है। वो पूरी ताकत लगा रहे थे पर साइकिल आगे नहीं बढ़ रही थी। तभी अचानक बगीचे में पता नहीं कहाँ से कुछ कुत्ते आ धमके और पिताजी और साइकिल की तरफ देख कर ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगे…. ऐसा लग रहा था कि वो कुछ देख कर भौंके जा रहे हों…. भौंकते-भौंकते अचानक कुत्ते रोने भी लगे, पिताजी हड़बड़ा गए, कुछ समझ नहीं आया…. सोने पे सुहागा ये कि बगीचे में अचानक ढेर सारे कौवों की 'काँव-काँव' की आवाज़ भी आने लगी। अभी कुछ दूर आगे बढ़े ही थे कि तभी अचानक'धड़ााम!' साइकिल का टायर फट गया। पिताजी संभल नहीं पाए और नीचे गिर पड़े।


तभी अचानक पूरे बगीचे में किसी औरत के हंसने की भयानक आवाज गूंजने लगी। पिताजी ने पीछे मुड़कर देखा तो वो औरत गायब थी! वो डर के मारे सुन्न होकर नीचे ही बैठे थे कि तभी वो औरत पेड़ों के पीछे से 'हवा में उड़ती हुई' सामने आई और पागलों की तरह हंसने लगी। अचानक एक तेज हवा के झोंके से उसका घूंघट हटा और पिताजी की चीख निकल गई। उसके बाल हवा में लहरा रहे थे, बड़े-बड़े पीले और नुकीले दांत, मुड़े हुए नाखून और एक डरावना, कटा-फटा चेहरा!

वो कोई औरत नहीं, एक खौफनाक चुड़ैल थी! अचानक से माहौल में एक अजीब सी दुर्गंध फैल गई, जैसे कहीं कोई मांस जल रहा हो। हर तरफ सड़न थी... ऐसी दुर्गंध से मानो दम घुट रहा हो....


पिताजी उठे, साइकिल वहीं छोड़ी और अपनी जान बचाकर गाँव की तरफ दौड़े। पर वो चुड़ैल हवा में उड़ते हुए उनका पीछा करने लगी। उसने हवा में ही पिताजी को पीछे से पकड़ लिया और उठाकर दूर फेंक दिया। पिताजी दूर जा गिरे, उनके घुटने छिल गए। वो संभले ही थे कि उसने फिर उन्हें उठाकर पटक दिया। अब पिताजी बुरी तरह घायल हो चुके थे। वो हिम्मत कर फिर खड़े हुए, पर वो डायन फिर सामने खड़ी हुई और जोर से हंसी। उसने चीखकर कहा"तुम सब मरोगे! एक-एक करके मरोगे! मैं किसी को नहीं छोड़ने वाली, मैं तुम सबका यहाँ इंतज़ार कर रही हूँ!" उसकी आवाज कभी बूढ़ी औरत जैसी लगतीतो कभी छोटे बच्चे जैसी।

 


इतना कहकर उसने अपना हाथ पिताजी के गले की तरफ बढ़ाया और उन्हें हवा में उठा लिया! पिताजी का दम घुटने लगा, वो छटपटाने लगे। फिर उसने उन्हें जमीन पर दे मारा। पिताजी लुढ़कते हुए पास ही एक 'सूखे कुएं' में जा गिरे। वो बिल्कुल असहाय हो चुके थे। कुएँ के अंदर अंधेरा इतना गहरा था कि अपने हाथ भी नहीं दिख रहे थे। तभी नीचे कहीं से नाखून घिसटने की आवाज आने लगीजैसे कोई दीवार चढ़कर ऊपर रहा हो। वो चुड़ैल फिर उस कुएं के मुहाने पर आई और कहने लगी"तुम सबको इसी जगह लाकर मारूँगी! तुम सब मेरे हाथ से मरोगे!"



उसने फिर से पिताजी का गला पकड़ा। उसी छीना-झपटी में पिताजी के शर्ट की जेब फट गई। उस जेब में एक कागज की पुड़िया थी, जिसमें वही 'भभूत' रखी थी जो पिछले रात मकान मालिक ने दी थी। पिताजी उसे जेब में रखकर भूल गए थे। जैसे ही वो पुड़िया फटी, वो भभूत पिताजी पर और उस चुड़ैल पर भी गिरी।


राख के गिरते ही वो चुड़ैल ऐसी चीखी मानो उसे आग लग गई हो! वो छटपटाती हुई वहां से गायब हो गई। पिताजी कुएं में गिर गए, उनके ऊपर वो पवित्र राख गिरी हुई थी जिसकी वजह से अब वो चुड़ैल उन्हें हाथ नहीं लगा सकती थी। पूरे बगीचे में उसकी भयानक चीखें गूंज रही थीं"तुम सब नहीं बचोगे! कोई नहीं बचेगा!" और फिर... पिताजी वहीं बेहोश हो गए।


सुबह करीब 9 बजे, जब बगीचे के रास्ते लोगों की आवाजाही शुरू हुई, तब उनकी आँखें खुलीं। उन्होंने वहीं से चिल्लाया"कोई है? बचाओ मुझे!" आवाज सुनकर लोग कुएं के पास आए और देखा। लोग पहचान गए"ये तो राम जतन का लड़का है! यहाँ क्या कर रहा है?" लोगों ने उन्हें बाहर निकाला और खाट पर लिटाकर घर ले आए। दादाजी उनकी हालत देखकर घबरा गए और गाँव के ओझा को बुलाया। ओझा ने झाड़-फूंक की और कहा"ये सुरक्षित है, इसके ऊपर अब कोई साया नहीं है, इसे डॉक्टर के पास ले जाओ।" पिताजी का दो दिन तक इलाज चला।

एक हफ्ते बाद जब वो बेहतर हुए, तो उन्होंने गाँव वालों को पूरा किस्सा सुनाया। तब किसी ने कहा"बेटा, गाँव में वो कहावत ऐसी ही नहीं बनी है। जो तुम्हारे साथ हुआ, वैसा कई लोगों के साथ हो चुका है। तुम बहुत भाग्यशाली हो जो जिंदा लौटे हो, बाकियों का तो बस मृत शरीर ही वहां से आया है।"


बुजुर्गों ने उस बगीचे की जो पूरी कहानी बताई, वो रूह कंपा देने वाली थी:

बगीचे का इतिहास: बात साल 1960 की है। गाँव में एक नई-नवेली दुल्हन ब्याह कर आई थी। शादी के कुछ महीनों बाद ही गाँव में अजीब घटनाएं होने लगीं। रात के अंधेरे में जानवर गायब होने लगे और सुबह उनकी लाशें बगीचे में मिलतीं। हद तो तब हो गई जब छोटे बच्चे गायब होने लगे और उनके क्षत-विक्षत शरीर उसी बगीचे में मिलने लगे। धीरे-धीरे उस दुल्हन का पूरा परिवार खत्म हो गया, सिर्फ उसका पति बचा।


मुखिया के कहने पर गाँव वालों ने पहरा दिया। एक रात उन्होंने देखा कि वही दुल्हन रात के सन्नाटे में बगीचे में जा रही थी। लोगों ने पीछा किया और देखा कि वो वहां तंत्र-मंत्र कर रही थी। देखते ही देखते वो जवान दुल्हन एक बूढ़ी भयानक डायन में बदल गई। गाँव वालों ने उसे वहीं पकड़ लिया और रस्सी से बांध दिया। उसके पति को बुलाया गया, तो उसने रोते हुए कहा"मुझे पहले ही पता चल गया था कि ये एक डायन है, ये मेरे पूरे घर को खा गई और मुझे भी खोखला कर दिया है।"

 


गाँव वालों और मुखिया ने तय किया कि इसे जिंदा नहीं छोड़ना है। उन्होंने उसके हाथ-पैर बांधे और उसी सूखे कुएं में फेंक कर 'आग' लगा दी। जलते-जलते वो चीख रही थी"किसी को नहीं छोड़ूँगी! सब मरेंगे!" और वो वहीं जलकर राख हो गई। बाद में ओझाओं ने उसे उसी बगीचे में कीलों से 'कैद' कर दिया। तब से वो हर रात वहां राहगीरों का इंतजार करती है। पिछले 25 सालों में कुल 11 लोग वहां अपनी जान गंवा चुके हैं।

ये मेरे पिताजी की कहानी गाँव में आज भी मशहूर है। वो बगीचा और वो सूखा कुआँ आज भी वहां मौजूद हैं, पर अब वहां पक्की सड़क बन चुकी है इसलिए लोग कम जाते हैं। पिताजी बताते हैं कि उस रात जब उनकी जेब फटी थीतो भभूत की पुड़िया पूरी खाली नहीं हुई थी। उसका थोड़ा हिस्सा आज भी उस पुराने बगीचे के कुएँ में पड़ा है। अब पिताजी रेलवे में टिकट चेकर हैं और हम शहर में रहते हैं। पर जब भी फैमिली गेट-टुगेदर होता है, ये कहानी जरूर निकल आती है। पिताजी आज भी उसी डर के साथ ये सुनाते हैं।

पिताजी के पास एक और भयानक कहानी है जो वो हमें सुनाते हैं, पर वो अगली बार...

लेकिन एक बात जो आज भी हमें डराती हैपिताजी कहते हैं कि भले ही वो डायन उस बगीचे में कैद है, पर उसका चेहरा आज भी उन्हें कभी-कभी अचानक भीड़ में या घर की खिड़की के बाहर दिख जाता है। ऐसा लगता है जैसे वो उस बगीचे की बंदिशों से आजाद हो चुकी है और पिताजी का पीछा आज भी नहीं छोड़ रही है। उसके नाखूनों के वो गहरे निशान आज भी पिताजी के गले पर मौजूद हैं, जो उस रात के सच होने का एहसास दिलाते हैं।

क्या लगता है आपको? क्या वो डायन वाकई आजाद हो चुकी है? क्या वो उस रात का अपना अधूरा काम पूरा करने के लिए फिर से लौटेगी? क्योंकि कल रात... पिताजी ने सोते हुए अपना गला वैसे ही पकड़ा था, जैसे उस रात उस डायन ने पकड़ा था...


Youtube Musical Story - https://youtu.be/i_D_aTVa6Bo

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